वन्दे मातरम्।

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महाभारत की कहानी 1

Posted On: 1 Dec, 2011 मस्ती मालगाड़ी में

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mahabharat
महाभारत की कहानी जितनी बड़ी, रोचक और घटनाक्रमों वाली है, ऐसी कोई दूसरी कथा नहीं है। महाभारत हमें कर्म करने की शिक्षा देती है, इस कथा का मूल केंद्र कर्म ही है। यहां हर पात्र एक जिम्मेदारी से बंधा हुआ है और सारे पात्र आपसी रिश्तों में गूंथे हुए हैं। महाभारत की कथा शुरू होती है पांडवों के पड़पौते जनमजेय के नाग यज्ञ से।

अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र जनमेजय राजा बने। राजा जनमेजय को पता चला की उनके पिता की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई है तो उन्होंने संपूर्ण नाग जाति से बदला लेने के लिए सर्प यज्ञ किया जिसमें सभी लोकों में रहने वाले खतरनाक सर्प आ-आकर गिरने लगे। तभी आस्तिक नामक ऋषि ने वहां आकर उस सर्पयज्ञ को रुकवाया तथा नागों की जाति को समाप्त होने से बचाया। यज्ञ के पश्चात जब राजा जनमेजय दरबार लगाकर बैठे थे वहां श्रीकृष्मद्वैपायन वेद व्यास आए। जनमेजय ने उनका विधिवत आदर सत्कार किया। तब राजा जनमेजय ने महर्षि वेद व्यास से कहा कि- आपने कौरवों और पाण्डवों को अपनी आंखों से देखा है। वे तो बड़े महात्मा थे फिर उन लोगों में अनबन का क्या कारण हुआ?

कुरुक्षेत्र में जो युद्ध तथा उसमें क्या-क्या घटनाएं घटीं। उनकी पूरी कहानी मुझे सुनना है। तब वेद व्यासजी ने अपने शिष्य वैशम्पायन से महाभारत की कथा जनमजेय को सुनाने को कहा। वैशम्पायन ने बताया कि महाभारत की कथा एक लाख श्लोकों में कही गई है। इसके श्रवण, कीर्तन से मनुष्य सारे पापों से छूट जाता है। इसमें भरतवंशियों के महान जन्म का वर्णन है इसलिए इसको महाभारत कहते हैं। भगवान श्रीकृष्मद्वैपायन ने तीन साल में इस रचना को पूरा किया है। यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। महाभारत की कथा का आरंभ महर्षि वैशम्पायन ने यहीं से किया है।

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